Wednesday, 10 January 2018

प्रेस विज्ञप्ति 11 जनवरी 2018 “उत्तराखंड मुख्य सचिव को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस”



श्रीनगर बाँध आपदा संघर्ष समिति व माटू जनसंगठन 


 
प्रेस विज्ञप्ति                                                                        11 जनवरी 2018
“उत्तराखंड मुख्य सचिव को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस”

माननीय  उच्च न्यायालय ने उत्तराखंड 2013 में आई आपदा में श्रीनगर बांध के कारण प्रभावित हुए परिवारों की ओर से अलकनंदा हाइड्रो पावर कंपनी लिमिटेड पर दाखिल मुआवजे के लिए चल रहे केस में उत्तराखंड के मुख्य सचिव को समुचित शपथ पत्र दाखिल करने के लिए कहा है। अगली तारीख 6 हफ्ते बाद की दी है.

 ज्ञातव्य है कि 2013 में आई आपदा में अलकनंदा गंगा पर बने श्रीनगर बांध कंपनी “अलकनंदा हाइड्रो पावर कंपनी लिमिटेड कंपनी” का नदी किनारे रखा मलबा अलकनंदा नदी में बह गया. इस लाखों टन मलबे के कारण श्रीनगर शहर के निचले हिस्सों में जब पानी भरा तो यह मलवा भी घरों में गैर सरकारी और सरकारी इमारतों में घुस गया. जब पानी धीरे-धीरे नीचे नीचे उतरा तो यह पूरा क्षेत्र लगभग समाधिस्त हो गया था. घरों में 8 फुट मिट्टी तक भर गई थी।

बांध कंपनी द्वारा लाई गई इस आपदा पर “ श्रीनगर बांध आपदा संघर्ष समिति” तथा “माटू जन संगठन” ने 2013 में राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण में “अलकनंदा हाइड्रो पावर कंपनी” पर मुआवजे के लिए दावा दायर किया. राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने 19 अगस्त 2016 में अपने आदेश में वादियों को सही ठहराते हुए 9 करोड़ 27 लाख का मुआवजा मंजूर किया था. बांध कंपनी उसके खिलाफ माननीय उच्चतम न्यायालय में अपील दाखिल की थी. माननीय उच्चतम न्यायालय ने अपने 3 अक्तूबर २०१६ के आदेश में  प्रभावितों को अपने दावे उप जिला अधिकारी के पास जमा करने के लिए और उप जिलाधिकारी द्वारा उस पर अपनी रिपोर्ट न्यायलय में दाखिल करने का आदेश  दिया था।

प्रभावितों के वकील श्री संजय पारीख ने अदालत को बताया की प्रभावितों ने 2016 में अपने विस्तृत दावे  उप जिला अधिकारी के समक्ष दायर किए. किंतु 1 साल बीत जाने के बाद भी राज्य सरकार ने अभी तक उस पर अपनी रिपोर्ट दाखिल नहीं की है. माननीय न्यायाधीश श्री मदन लोकुर तथा माननीय न्यायाधीश श्री दीपक गुप्ता की बैंच ने  नाराजगी जताते हुए उत्तराखंड सरकार को अपना शपथ पत्र दाखिल करने के लिए कहा. बैंच 6 हफ्ते बाद पुनः केस की सुनवाई करेगी।
राज्य सरकार इस मसले पर गंभीर होती तो दो-तीन महीने में  ही जांच को पूरा करके अपनी रिपोर्ट दाखिल कर सकती थी. किंतु वादी कई बार उप जिलाधिकारी व जिलाधिकारी महोदय को मिले ओ उन्हें  एनजीटी के आदेश की प्रतियां, उच्चतम न्यायालय के आदेश की प्रतियां भी दी गई. किंतु जांच का काम बहुत ही धीमी गति से चलाया जा रहा है.

हमारी अपेक्षा है कि माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद संभवत सरकार व स्थानीय प्रशासन मामले की गंभीरता को समझेंगे और तुरंत कार्यवाही करके शपथ पत्र समय पूर्वक दाखिल करेंगे ताकि प्रभावितों को न्याय मिल सके. आदेश सलग्न है.

चंद्र मोहन भट्ट,      विजयलक्ष्मी रतूड़ी,         हरिप्रसाद उप्रेती,     विमलभाई

Sunday, 24 December 2017

प्रेस विज्ञप्ति 24 दिसम्बर, 2017


भू स्वामी संघर्ष समिति एवं माटू जनसंगठन




बाँध नहीं चाहिए : पिंडर गंगा बहती चाहिए

देवसारी बांध की पुनर्वास जनसुनवाईयां विरोध के कारण रद्द
 उत्तराखंड के चमोली जिला में पिंडरगंगा नदी पर प्रस्तावित 252 मेगावाट के देवसारी बांध, के लिए बिना किसी तरह की पूर्व व सही सूचना दिए देवसारी बांध से प्रभावित होने वाली निजी भूमि की जनसुनवाई 20 दिसंबर, 2017 से चालू की गई. थराली में चेपड़ो, सुनला, गड्कोट, चिडिंगा तल्ला गाँवो के लोग जब जनसुनवाई के लिए पहुंचे और अधिकारी नदारत थे. घंटो बाद आकर मात्र 10 मिनट में उन्होंने सुनवाई निपटाई. लोगों ने जमकर विरोध किया लोगों का कहना था कि कंपनी में कब सर्वे किया, कब आए, प्रभावितों की सूची क्या है? यह सब कुछ भी नहीं बताया गया?
 ए० डी० एम० ने कहा की गांव स्तर पर जनसुनवाई करेंगे. जिसके बाद सब अधिकारी चेपड़ो और साहू गांव पहुचे. जंहा मात्र 10 मिनट में जनसुनवाई निपटा दी गई. 22 दिसंबर को पदमल्ला, तलौर गांव में जनसुनवाई करने ए० डी० एम०, तहसीलदार, कंपनी के अधिकारियों के साथ पहुंचे. लोगों ने उनका घेराव किया और बिना सहमति के बांध थोपने का आरोप लगाते हुए बांध निर्माण को तुरंत निरस्त करने की मांग की गई. “सतलुज कंपनी वापस जाओ के नारों के  साथ आधे घंटे से ज्यादा अधिकारियों का घेराव किया गया. ग्रामीणों ने कहा कि यह क्षेत्र भूकंप, दैविक आपदा, जैव विविधता और धार्मिक दृष्टि से अतिसंवेदनशील है परियोजना से विकास नहीं विनाश होगा.
ज्ञातव्य है की 2009 से पर्यावरण जनसुनवाईयों में लोगो का जबरदस्त विरोध रहा. देवसारी बांध संबंधी पर्यावरण आकलन रिपोर्ट व पर्यावरण प्रबंधन योजना लोगो को ना तो दी गई ना समझाई गई। दो जनसुनवाई रद्द होने के बाद 20 जनवरी 2011 को पिंडरगंगा के तट पर चेपडो गांव में हुई तीसरी जनसुनवाई ग्रामीणों की आवाज को दबा कर पूरी की गई। लोगो को बात रखने का मौका नहीं दिया गया। कंपनी के अधिकारियों ने लोगों को रोका। पुलिस लगा कर लोगों को मंच पर अकेले तक नहीं जाने दिया गया। मंच से बांध के समर्थन और विरोध में हाथ खड़े करने की आवाज दी गई। यह पूरी तरह एक सफल नाटक था जिसमे लोगों को धोखा देकर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी जिला प्रशासन के अधिकारी भाग गए। जिसके बाद भेजे गए किसी पत्र का जवाब नहीं दिया गया। 3 अप्रैल को हमने लोक जन सुनवाई का आयोजन किया जिसमे हजारो लोगो ने आकर पिंडरगंगा को अविरल बहने देने की घोषणा की. देश के माननीय लोग इसके गवाह रहे. सरकार को समय समय पर पिंडर की जनता ने बता दिया है की हमें बांध नहीं चाहिए. 2009 से 2017 तक बांध रुका ही हुआ है. सन 2013 की आपदा में यहां की परिस्थिति पूरी तरह बदल गई है. गांवो में भूस्खलन की घटनाएं बढ़ी है. पिंडर नदी का रुख बदल गया है.
13 अगस्त को माननीय सर्वोच्च न्यायलय ने उत्तराखंड के सभी बांधो की किसी भी तरह की स्वीकृत पर रोक लगा दी थी. पर्यावरण मंत्रालय की विशेषज्ञ समिति ने धोखे से हुई जनसुनवाई को मानते हुए मात्र उसमें उठाए कुछ मुद्दों पर ध्यान दिया और अपनी ओर से पर्यावरण  स्वीकृति के लिए बांध को अनुमोदित किया किंतु साथ में यह शर्त लगाई थी पर्यावरण स्वीकृति वन स्वीकृति के बाद ही ली जाए. वन आकलन समिति की बैठकों में देवसारी बांध के पीछे कैल नदी पर स्थित 5 मेगावाट की देवाल  परियोजना का मुद्दा सामने आया. 5 मेगावाट की देवाल परियोजना, देवसारी बांध के जलाशय में डूब रही है. देवसारी बांध के परियोजना प्रयोक्ता सतलुज जल विद्युत निगम ने वन आकलन  समिति के सामने कहा है कि वह एक दीवार बना कर देवाल परियोजना को सुरक्षित कर देगी. यह समझ से परे है कि एक नदी को दीवार बनाकर कैसे रोका जा सकेगा? इसी तरह की तमाम ग़लतियों के साथ इस बांध को आगे धकेला जा रहा है.
नवम्बर, 2017 में पिंडर घाटी के हिमनी गाँव में राज्य के मुख्यमंत्री ने भी घोषणा की कि 5 नहीं 252 मेगावाट का बांध चाहिए. जिसका पूरी घाटी में जबरदस्त विरोध हुआ.
महत्वपूर्ण बात है कि गांव को अभी तक वन अधिकार कानून 2006 के अंतर्गत अधिकार भी नहीं दिए गए हैं। ऐसे में अचानक से पुनर्वास संबंधी बैठकों का, लोगों को पुनर्वास नीति उपलब्ध कराए बिना किये जाना गलत है। हम पूरी तरह से इस असंवैधानिक प्रक्रिया का व बांध का विरोध करते हैं.
हम मांग करते हैं कि:-
-बांध संबंधी सभी कागजातों, पर्यावरणीय प्रभाव आकलन रिपोर्ट पर्यावरण प्रबंधन योजना को हिंदी में लोगों को दे कर समझाई जाए।
उसके बाद ही जनसुनवाई का आयोजन किया जाए. किन्तु सरकार अपनी कमियों को छुपाकर किसी भी तारा से बांध को बनाना चाहती है. जिसे घाटी की जनता नहीं होने देगी.

दिनेश मिश्र, महिपत सिंह, जीवनचन्द्र, कपूरचन्द्र, मुन्नी देवी, केदार दत्त, देवकी देवी, हेम मिश्र, विमलभाई

Friday, 15 December 2017

प्रेस विज्ञप्ति: 8-12 2017

 

माटू जनसंगठन टिहरी 
            विस्थापित जन कल्याण समिति                                                                                                                  ----------------------------------------------------------------------------------------------------
 प्रेस विज्ञप्ति:                                                             8-12 2017
टिहरी बांध विस्थापितों की सुध नहीं और नए बांधो पर जश्न?

टिहरी बांध से हुये विस्थापितों व प्रभावितों की समस्याओं का समयबद्ध निराकरण कब होगा?



उत्तराखंड का गंगा पर बना बहु प्रचारित टिहरी बांध प्रभावित अभी भी पानी जैसे मुलभूत अधिकार के लिए तरस रहे है उनकी सुविधाओ पर दबंगों का कब्ज़ा हो रहा है.
बांध बनने 11 सालो बाद भी टिहरी बांध के पुनर्वास की समस्याओं का समाधान अभी तक नही हो पाया है राज्य सरकार भी अपने स्तर पर हमारी समस्याओं का कुछ समाधान कर ही सकती है। माननीय मुख्यमंत्री जी आपने पुनर्वास की समस्याओं को देखते हुये जून 2017 में केन्द्रीय बिजली मंत्री के साथ एक बैठक में टिहरी झील का पानी 825 मीटर तक ही रखने के फैसला किया था।
टिहरी बांध विस्थापितों के ग्र्रामीण पुनर्वास स्थलों, हरिद्वार अभी भी पुनर्वास निति के अनुसार जिन की मूलभूत सुविधाओ के हक़दार है वो अभी तक नहीं मिल पाई है.
हरिद्वार जिले में पथरी भाग 1, 2, 3 4 में टिहरी जिले से लगभग 40 गांवो के लोगो को पुनर्वासित किया गया है. सुमननगर विस्थापित क्षेत्र व रोशनाबाद विस्थापित क्षेत्र  में भी भागीरथी भिलंगना नदी घाटी के कितने ही गाँवो जैसे खांड-बिडकोट, सरोट, छाम, सयांसू आदि गांवों से प्रभावितों को विकास का सपना दिखा कर लाया गया.  
किन्तु जो मूलभूत सामुदायिक सुविधायें अधिकार रुप में पुनर्वास के साथ ही मिलनी चाहिये थी वो 37 साल बाद भी सरकार नहीं दे पाई है।  लोगो का जीवन दुष्कर हो गया है।
भूमिधर अधिकार, स्वास्थयः प्राथमिक चिकित्सा, जच्चा-बच्चा केन्द्र आदि भी नही है। शिक्षा के लिए समुचित व्यवस्था नहीं. अंदरूनी इलाको में यातायात की कोई सरकारी व्यवस्था तक नहीं है। जंगली जानवरों से रक्षा हेतु सुरक्षा दिवार का काम भी कब पूरा होगा? बिजलीः नीति के अनुसार 100 यूनिट बिजली मुफ्त मिलनी चाहिये थी। जो नहीं मिली. पेयजल व सिंचाईः इसके लिये विस्थापितों ने ज्यादातर अपनी व्यवस्था की है। सिंचाई के लिये बरसों की मांग के बावजूद हमें पास बहती गंगनहर से सिंचाई का पानी नही मिल पाया है। मंदिर, पितृकुटटी, सड़क, गुल आदि की सुविधायें भी सालों बाद व्यवस्थित रुप में नही मिल पाई है। पीने का पानी विस्थापितों का पुनर्वास नीति के अनुसार हक है।
सुमननगर में भी सिंचाई व पीने के पानी की भयंकर समस्या है। जबकि मात्र 1 किलामीटर के दायरे में टिहरी बंाध से दिल्ली व उत्तर प्रदेश को पानी जाता है ।
टिहरी बांध से हो रहे 12 प्रतिशत मुफ्त बिजली के लाभ से प्रभावितों की समस्यायों का समाधान संभव है। राज्य सरकार को प्रतिदिन आमदनी भी हो रही है। जो आज तक करीबन् अढाई हजार करोड़ से ज्यादा होगी। जिसे टिहरी बांध विस्थापितों के लिये खर्च करने का प्रावधान है। ये पैसा कान्हा गया?
हम लगातार सरकारों से यह मांगे विभिन्न समयों पर उठाते आ रहे हैः-
  • विस्थापितों को मूलगांव जैसा ‘‘संक्रमणी जैड ए श्रेणी क‘‘ स्तर वाला भूमिधर अधिकार तुरंत दिये जाये। जिसके लिये सभी ग्रामीण पुनर्वास स्थलों को राजस्व ग्राम भी घोषित करने की प्रक्रिया में तेजी लाई जाये। जिसके लिये अलग से कर्मचारी नियुक्त किये जाये।
  • हरिद्वार के ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले टिहरी बांध विस्थापितों की शिक्षा, स्वाथ्यय, यातायात, सिंचाई व पेयजल और अन्य मूलभूत सुविधायें तुरंत पूरी की जाये। इन कार्यो के लिये टिहरी बांध परियोजना से, जिसमें कोटेश्वर बांध भी आता है, मिलने वाली 12 प्रतिशत मुफ्त बिजली के पैसे का उपयोग किया जा सकता है।
  • टिहरी बंाध से दिल्ली व उत्तरप्रदेश जाने वाली नहरों से बांध प्रभावितों को पानी मिलना चाहिये।
  • पुनर्वास के लिये इंतजार कर रहे प्रभावितों का तुरंत पुनर्वास किया जाये।
·         ऊर्जा मंत्रालय की जलविद्युत नीति 2008 के पेज नम्बर 36 अध्याय 10.1. आई अनुसार विस्थापितों को 10 साल तक 100 यूनिट मुफ्त बिजली या नकद दिये जाने के प्रावधान को लागू करें।
·         रोशनाबाद की समस्या पर अविलम्ब कार्यवाही हो. विस्थापितों को पानी उनके ही अधिकार में मिलना चाहिए. ये उनका हक़ है और सरकार की जिम्मेदारी है
 इन सब कामों के लिये समयबद्ध कार्यक्रम लिया जाये।
इस समय केन्द्र, उत्तराखंड व उत्तरप्रदेश राज्यों में एक ही दल की सरकारें है। यह एक सुनहरा मौका है कि टिहरी बांध विस्थापितों की समस्याओं का समाधान आसानी किया जा सके। इसके लिये मजबूत इच्छा शक्ति व कर्मठ सरकारी महकमें की जरुरत है। जिसकी हमे सरकार से अपेक्षा है।
हम लगातार सरकारों से मांग उठा रहे है. किन्तु सरकारे अनसुनी ही कर रही है. प्रश्न ये है की फिर नए बांधो पर कैसे जश्न हो रहा है?
माटू जनसंगठन,  टिहरी विस्थापित जन कल्याण समिति के साथी

पूरण सिंह राणा,   सोहन सिंह गुंसाई,   राघवानंद जोशी,   जयकिशन न्यूली,   अतोल सिंह गुंसाई, विमल भाई





रोशनाबाद में विस्थापितों को उनका पानी भी नहीं:--
रोशनाबाद सामुदायिक भवन, प्राथमिक स्कूल इमारत पर किसी नवोदय नगर विकास समिति का कब्जा है। भी सड़क नही, सिंचाई व पीने के पानी की व्यवस्था, स्वास्थ्य केन्द्र, स्कूल व गन्दे नाले यानि डेनेज की व्यवस्था नही है। ग्यारह हजार अपने ही सामुदायिक भवन में किसी काम के लिए देने पड़ते है. पीने के पानी के कनेक्शन के लिए 5000 और हर महीने 300 देने होते है. जिसकी अनियमितताओं के बारे में बहुत शिकायत करने पर सीडीओ हरिद्वार ने जांच की। जिसकी रिर्पोट में इस समिति के चुनाव को गलत बताया गया है तथा वित्तीय लेने-देन में बहुत अनियमितता पाई गई है। किन्तु कोई कार्यवाही नहीं हुई अभी तक. बल्कि शिकायत करने वालो को डर के साये में जीना हो रहा है.
श्रीमान चंद्रमोहन पाण्डे जी, सुपरिटेंडेंट इंजीनियर ने 12 अक्टूबर 2017 को पुनर्वास विस्थापित क्षेत्र की समस्याओं को स्वयं देखने की बात स्वीकार की थी. विस्थापित छेत्र रोशनाबाद में जांच के लिए अधिशासी अभियंता को भेजा गया, जो कि दिनांक ३ नवम्बर को आये ओर मोकै पर सारी समस्याये देखी. सड़क नहीं , स्वास्थ्य सेवाएं नहीं, स्कूल नहीं , सामुदायिक भवन पर कब्जा और पीने के पानी की व्यवस्था  पर भी  बाहरी लोगों का का कब्जा. अधिशासी अभियंता ने स्वय देखा कि प्रोपर्टी डीलरो की नवोदय नगर समिति ने सामुदायिक भवन एंव ओवर हेड टैंक पर कब्जा कर रखा है।

अधिशासी अभियंता के जाने के बाद नवोदय नगर समिति के कुछ लोगों श्री अतुल गोसाई के  प्लाट का पानी का नल उखाड़ कर अपने साथ ले गए  तथा धमकाया गया कि यहां से चले जाओ। यह पूरी तरह गुंडागर्दी है . सिडकुल थाना हरिद्वार में इसकी लिखित शिकायत भी दी गई है। इस संदर्भ में जब श्री आर के गुप्ता जी से 9 नवंबर को जब संपर्क किया गया तो उनका कहना था कि वे दिल्ली से आए अधिकारियों के साथ व्यस्त हैं इसलिए उन्होंने हमें मंगलवार को संबंधित कार्यों के लिए आदेश की प्रति देने का  बात कही है. किन्तु ये आदेश नहीं रिपोर्ट थी जो की पुनर्वास निदेशक को भेजी गई थी.

टिहरी विस्थापित जन कल्याण समिति रोशनाबाद  पुनर्वास निदेशक श्रीमती मोनिका जी को दो बार मिल चुके है, कितनी बार श्री चंद्रमोहन पांडे जी को मिले. अभी 4 दिन पहले भी मिले. रिपोर्ट पुनर्वास निदेशक श्रीमती मोनिका जी के पास है और लोगो को अभी तक आश्वासन ही मिला है. टिहरी विधायक श्री धन सिंह नेगी जी ने, हरिद्वार के पूर्व विधायक श्री अमरीश जी ने व प्रताप नगर के पूर्व विधायक विक्रम सिंह नेगी भी पुनर्वास निदेशक से बात की है.

श्रीमती मोनिका जी हरिद्वार में अधिकारी रह चुकी है उनसे अपेक्षा है की वे तुरंत न्याय के हक़ में आदेश देंगी. हम राह देख रहे है की कब ये आश्वासन हमारे अधिकार का पानी बनेगा. न्याय में देरी न्याय से वंचित करना होता है.
विस्थापितों को पानी उनके ही अधिकार में मिलना चाहिए. ये उनका हक़ है और सरकार की जिम्मेदारी है